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रचना:- सुनो! विभीषन

 







 सुनो! विभीषन 


राज-काज तुम कर न सके,

परिवार ले कर चल न सके |


जिसने तीनों लोकों पे राज किया 

ऐसा तेरा भ्राता था 

मेघनाथ जैसे, तेरे कुल के दीपक थे 

सती मंदोदरी ,तेरी कुल की शोभा थी 

उस कुल के भी तुम हो न सके ! 


बुरा ना मानना, हे! विभीषन

मैं अर्जुन , अपमान न करता 

मैं तो बस पूछ रहा हूं 

तुम जीवन कैसे जी ; लोगे |


बुद्धिमान हो कर भी, बुद्धी को काम ले न सके |

उस , समय साथ दे न सके 

अब रोने से क्या होगा ,

उठ खड़े हो कर राज सम्भालो 

अब रोने से क्या होगा | 


जब स्वयं राम ने यह कह दिया कि

 ये कलंक तुम मिटा न सकोगे |

विभीषन, आप ज्यादा  जी न सकोगे 


रचना :- अर्जुन दान चारण 

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